I am Back… just for this hour :)

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लकीरें
ख्वाबों की वीरान् चॉक्.
उस् चॉक् पे एक् तन्हा खङे तन्हाई के दरख्त् पे, तक़्दीर् की टेहनियो से जुदा होते हैं कुछ् अरमानों के पत्ते.
उस् वीरान् चॉक् पे फ़िर् एक् बार्, एक् टूटी टेहनि से, दरख्त् के पास् की मिट्टि पे,
कुछ् लकीरें दर्ज् करने कि चाह् उठ्ती है मन् में.
पिछ्ले सालों की दर्ज् सब् लकीरें, कुछ् लम्बी, कुछ् टेढी, कुछ् कश्-म-कश् की मार् से लचकी हुइं,
कुछ् हलकी कुछ् गेहरी..सब् की सब्.. असलियत् की बे-रहम् हवाओं के साथ् उड् चुकी हैं.
हाथ् में थमी तद्-बीर् की टूटी टेहनी से खयालों कि लचकदार् कलाई के सहारे; जब् मिट्टी को तराशा जायेगा,
तब् कुछ् मुस्कुरती, कुछ् डगमगाती, कुछ् शरमाई हुई ऑर् कुछ् बड्-बोली लकीरें बह निकलेंगी.
कभी सोचता हुं कि हर् बार् के इस् खेल् के खिलाङियों के साथ थोङी सान्ठ गान्ठ कर लूं.
हवाओं को क्या चाहिये? उन के ज़ोर् से डोलते, काम्पते ऑर लड्खडाते कुछ् किरदार् ही तो..
शायद इतना काफ़ी होगा उनके गुरूर् के खाली कूएं को पाट्ने के लिये?
मैं दूंगा यह् सब, मैं खुद को सुपुर्द करुंगा इन हवाओं के.
शर्त बस इतनी होगी कि वो मेरी लकीरों कि तरफ़ रुख़् न करें…
बङी शर्त् है ना? है तो सही, पर अगर इस् एक् तरफ़ा सुलह के बावजूद यह हवाएं अपनी बद् मिज़ाजी जारी रखेंगी,
तो फ़िर् मेरे पास् कोई चारा नहीं रहेगा.
तो क्या और लकीरें दर्ज नहीं होंगी?… होंगी ना, लकीरें दर्ज होंगी,
लेकिन् रिश्तों की उथली मिट्टी पे नहीं, यह् लकीरें दर्ज होंगी तन्हाई के दरख्त पे, यकीन कि धार् से.
फ़िर् देखता हुं, इस् दरख्त को कैसे गिराती हैं यह् हवाएं.
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